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इंडिया वॉटर इम्पैक्ट समिट 2024
इंडिया वॉटर इम्पैक्ट समिट का प्रारंभ वर्ष 2012 में आईआईटी की सात संस्थानों के संघ द्वारा द्वारा गंगा रिवर बेसिन मैनेजमेंट प्लान विकसित करने के दौरान नदी बेसिन प्रबंधन के विषय में विभिन्न वैज्ञानिक, तकनीकी, सामाजिक- सांस्कृतिक, नीतिगत, कानूनी और प्रशासनिक विषयों पर स्पष्टता लाने के उद्देश्य से किया गया था। नदी बेसिन प्रबंधन के संदर्भ में देखा जाए तो असंख्य विविधताओं से भरे देश में विभिन्न हितधारकों के हित, रूझान और नदी की प्रक्रियाओं से जुड़ी समझ और दृष्टिकोण भी विविधतापूर्ण है। वर्ष 2015 में गंगा रिवर बेसिन मैनेजमेंट प्लान (जीआरबीएमपी) तैयार होने के बाद उपरोक्त विषयों पर अधिक स्पष्टता लाने के लिए छह वर्षों में प्रतिवर्ष शिखर सम्मेलन आयोजित किये गए। जिनका उद्देश्य था, नदी बेसिन प्रबंधन से संबंधित कुछ अस्पष्ट और विवादास्पद विषयों पर आपसी विमर्श और विश्लेषण के द्वारा वैज्ञानिक समझ और सर्वसम्मति विकसित करना। इसके साथ ही इन सम्मेलनों में बेसिन प्रबंधन के विश्लेषणात्मक उपकरण, डाटा संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति, निगरानी तंत्र और योजनाओं के क्रियान्वयन और नीतिगत मुद्दों पर सरकारी और निजी स्तर पर जारी प्रयासों और हितधारकों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने के तरीकों पर चर्चा हुई। तकनीक और नवीन अविष्कारों का उपयोग करते हुए भारत के समग्र जलीय पर्यावरण का बेहतर प्रबंधन करने पर गहन मंथन हुआ।
इंडिया वॉटर इम्पैक्ट समिट आज एक बहुप्रतीक्षित शिखर सम्मेलन है। जिसमें विषय विशेषज्ञ, शासकीय प्रतिनिधि, हितधारकों के प्रतिनिधि एक मंच पर नदी घाटी प्रबंधन और जलप्रबंधन के समक्ष खड़ी चुनौतियों और समाधान के नए विकल्पों पर विमर्श करते हैं। सम्मेलन के दौरान अलग-अलग सत्रों में वैज्ञानिक, तकनीकी और नीतिगत विषयों पर विचार-मंथन होता है, साथ ही केंद्र और राज्य सरकारों के प्रतिनिधि विभिन्न विषयों पर शासन के दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हैं। इन सत्रों में नवीन तकनीकों की समीक्षा करने के साथ, निवेशक और तकनीकी प्रदाता के हितों को समन्वित करते हुए विभिन्न पहलूओं की पड़ताल की जाती है ताकि भारत में जलप्रबंधन के क्षेत्र में तकनीक आधारित जलप्रबंधन की सुदृढ़ संस्कृति विकसित की जा सके।
इन प्रयासों के मध्य जलवायु परिवर्तन और उसके परिणामों को देखते हुए जल और पर्यावरण क्षेत्र में नवीन तकनीकों, नए आविष्कारों को सम्मिलित करने की आवश्यकता अब अनिवार्यता बन गई है। यही कारण है कि वर्ष 2023 से शिखर सम्मेलन द्विआयामी हो गया है। सम्मेलन के दो आयाम होते हैं – द इंडिया वॉटर इम्पैक्ट समिट (IWIS) और क्लाइमेट इन्वेस्टमेंट एंड टेक्नोलॉजी इम्पैक्ट समिट (CITIS)। शिखर सम्मेलन के दूसरे आयाम का उद्देश्य समीक्षा और परीक्षण के बाद प्रौद्योगिकी प्रदाताओं और संभावित निवेशकों को साथ जोड़ना है। इंडिया वॉटर इम्पैक्ट समिट के सहआयोजन में वैज्ञानिक समीक्षा में खरी उतरी तकनीकों के क्रियान्वयन, नई तकनीकों के लिए वित्तपोषण की विधियों और व्यवसाय के नए मॉडल्स जैसे विषयों पर समन्वित चर्चाएँ होंगी । जिससे इन तकनीकों का समावेश भविष्य में ऊर्जा, कृषि, शहरी विकास, परिवहन, अधोसंरचना विकास जैसे क्षेत्रों में किया जा सके क्योंकि यह सभी क्षेत्र पर्यावरण, जल, वायु, भूमि, नदियों और जल प्रबंधन से गहनता से अंतर्संबंधित हैं।
नौवीं इंडिया वॉटर इम्पैक्ट समिट में पिछले सत्रों की उपलब्धियों पर आधारित एक प्रदर्शनी लगाई जाएगी। साथ ही विगत वर्षों में नदी पुनर्जीवन और संरक्षण के लिए जमीनी स्तर पर क्रियान्वित की गई योजनाओं, परियोजनाओं, कार्यक्रमों और परियोजनाओं से प्राप्त अनुभवों पर विशेषज्ञों का विमर्श होगा और भविष्य की रणनीति तय की जाएगी।
भारत में नदी को स्वच्छ बनाने के लिए सम्मिलित प्रयासों की शुरूआत वर्ष 1985 में गंगा एक्शन प्लान के साथ हो गई थी। इन्ही प्रयासों को विस्तार देते हुए यमुना एक्शन प्लान भी बनाया गया। उसके बाद ऐसे ही प्रयास अन्य नदियों के लिए भी नेशनल रिवर कन्जर्वेशन प्लान (एनआरसीपी ) के तहत किये गए।
गंगा एक्शन प्लान, यमुना एक्शन प्लान और नेशनल रिवर कन्जर्वेशन प्लान की विस्तृत समीक्षा के बाद सात आईआईटी (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी) के संघ द्वारा वर्ष 2015 में गंगा रिवर बेसिन मैनजमेंट प्लान प्रस्तुत किया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य गंगा नदी को गंगा की संपूर्णता के साथ सहेजना था। जीआरबीएमपी (गंगा रिवर बेसिन मैनेजमेंट प्लान) में सुझाए गए कुछ बिंदुओं ने नदी पुनर्जीवन और संरक्षण के उद्देश्य से प्रारंभ किये गए नमामी गंगे कार्यक्रम के लिए मजबूत आधार तैयार किया।
नमामी गंगे के प्रारंभ में ही यह महसूस हुआ की जीआरबीएमपी के क्रियान्वयन के लिए विशेषज्ञों के मार्गदर्शन की आवश्यकता होगी साथ ही यह भी महसूस हुआ कि इस योजना की सफलता और इसकी गति, समय-समय पर योजना के मूल्यांकन, पुनर्मूल्यांकन और पुनर्विकास पर निर्भर करेगी। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए आईआईटी कानपुर के नेतृत्व में सेंटर फॉर गंगा रिवर बेसिन मैनेजमेंट एंड स्टडीज जिसे सी-गंगा के नाम से जाना जाता है, की स्थापना हुई। कई राष्ट्रीय महत्व के शैक्षणिक संस्थान जैसे आईआईटी, एनआईटी, आईआईएसईआर सी-गंगा के सदस्य संस्थान हैं, साथ ही सी-गंगा की विभिन्न परियोजना में भागीदार भी हैं। नेशनल मिशन फॅार क्लीन गंगा के सहयोग से सी-गंगा ना केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों के साथ भी साझेदारी में विभिन्न परियोजना में सक्रिय है। गौरतलब है कि एनएमसीजी (नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा अथवा स्वच्छ गंगा मिशन), नमामी गंगे कार्यक्रम की प्रमुख कार्यकारी संस्था है।
नदी पुनर्जीवन और संरक्षण के विभिन्न पहलू परस्पर अंतर्संबंधित हैं, जिन्हे चित्र क्रमांक एक में दिखाया गया है। जिसमें शामिल हैं – 1. उद्देश्य का निर्धारण, 2. रिवर बेसिन मैनेजमेंट प्लान और उसका ढांचा, 3. जमीनी स्तर पर कार्यवाही के लिए विज्ञान, तकनीक, नीति, कानून, प्रशासन, वित्त पोषण और जनभागीदारी के आयामों का उचित नियोजन, 4. क्रियान्वन के लिए अनिवार्य सहयोग जैसे राजनीतिक इच्छाशक्ति, सार्वजनिक व्यय, साझेदारी, भागीदारी, और कार्यपूर्ण करने की दृढ़ता, तथा 5. विभिन्न नीतियों, योजनाओं, कार्यक्रमों और लोगों के मध्य समावेशीकरण।
केंद्र और राज्य सरकारों, स्थानीय प्रशासन, स्वयंसेवी संस्थानों और नागरिक संगठनों द्वारा संचालित कई कार्यक्रम और गतिविधियां (जैसे स्वच्छ भारत मिशन, जल जीवन मिशन, गंगा एक्शन प्लान, यमुना एक्शन प्लान, नेशनल रिवर कन्जर्वेशन प्लान, नमामी गंगे कार्यक्रम, महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून, अटल भूजल योजना, अमृत सरोवर, कावेरी कॉलिंग, रैली फॉर रिवर, इत्यादि) हैं, जो नदी पुनर्जीवन से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संबंधित हैं। नौवीं इंडिया वॉटर इम्पैक्ट समिट का केंद्रीय विषय अतीत से सीखने के उद्देश्य हेतु ऊपर उल्लेखित विभिन्न पहलुओं के अंतर्गत बीते दशकों में नदी पुनर्जीवन और संरक्षण के प्रयासों की प्रभावकारिता का आंकलन करना और भविष्य के लिए रणनीति तैयार करना है।
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